(लेखक : राजू वैद्य ‘राज’):- सुबह राहुल जैसे ही सो कर उठा उसने तुरंत अपना मोबाइल फोन चेक किया। अरे वाह मेरे चैनल पर नौ सौ निन्यानवे सब्सक्राइबर पूरे हो गए, अब अगर एक सब्सक्राइबर और हो जाए तो पूरे हजार हो जाएंगे। राहुल खुश होते हुए अपने आप से बोला। उसने तुरंत एक-एक करके अपने सभी दोस्तों को फोन मिलाना शुरू कर दिया। पर हर तरफ से उसको एक ही जवाब मिलता था कि हमने तो तुम्हारा चैनल पहले से ही सब्सक्राइब किया हुआ है। राहुल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उसने अब ठान लिया था कि वह जल्द से जल्द अपने चैनल पर एक हजार का आंकड़ा छूकर रहेगा। वह जल्दी से तैयार हुआ और घर से निकल गया।
राहुल अभी घर से थोड़ी ही दूर चला था कि रास्ते में उसको उसका दोस्त मोहित आता दिखाई दिया। वह तुरंत मोहित के पास पहुंचा और बोला, “यार मोहित जल्दी से मेरा एक छोटा सा काम कर दे।”
“हाँ बोल ना, क्या काम है?” मोहित ने पूछा।
राहुल बोला, “यार आज मेरे यूट्यूब चैनल पर नौ सौ निन्यानवे सब्सक्राइबर पूरे हो गए हैं। अगर तू मेरा चैनल सब्सक्राइब कर देगा तो पूरे हजार हो जाएंगे और मेरा चैनल मोनेटाइज हो जाएगा।”
उसकी बात सुनकर मोहित बोला, “यार चैनल तो मैं तेरा जरूर सब्सक्राइब कर दूंगा, पर आज नहीं कर पाऊंगा, कल पक्का कर दूंगा।”
“कल क्यों? आज क्यों नहीं? यार एक मिनट का ही तो काम है।” राहुल हैरानी से बोला।
“भाई आज मेरा उपवास है।” मोहित ने कहा।
“तुम्हारे उपवास से मेरे चैनल का क्या लेना-देना? सीधी तरह से बोल ना कि तू मेरा चैनल सब्सक्राइब करना ही नहीं चाहता।” राहुल गुस्से से बोला और तुरंत वहां से निकल गया। मोहित ने उसको पीछे से आवाज भी लगाई पर राहुल ने उसकी एक ना सुनी।
राहुल अभी अपनी गली के नुक्कड़ तक ही पहुंचा था कि सामने से उसे एक सब्जी वाले भैया दिखाई दिए। उसने तुरंत सब्जी वाले भैया को रिक्वेस्ट की और अपना चैनल सब्सक्राइब करवा लिया।
दोपहर के करीब दो बज रहे थे। राहुल कुछ जरूरी सामान लेने के लिए बाजार गया हुआ था। अचानक उसकी नजर एक दुकान पर पड़ी। उसने देखा कि मोहित वहां बैठकर बड़े आराम से लंच कर रहा था। वह तुरंत मोहित के पास पहुंचा और गुस्से से बोला, “इसे कहते हैं सरेआम झूठ बोलना। यही है तुम्हारा उपवास?”
उसकी बात सुनकर मोहित आराम से बोला, “आज मेरा भोजन वाला उपवास नहीं बल्कि डिजिटल उपवास है। मैं हफ्ते में एक दिन किसी भी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट का उपयोग नहीं करता, चाहे वो मोबाइल फोन हो या लैपटॉप। यहां तक कि मैं डिजिटल उपवास वाले दिन टेलीविजन भी नहीं देखता।”
“पर तुम्हें डिजिटल उपवास की जरूरत क्यों पड़ी?” राहुल ने पूछा।
मोहित ने बताया, “क्योंकि मेरा स्क्रीन टाइम बहुत ज्यादा बढ़ गया था। मैं एक दिन में पांच से छह घंटे मोबाइल फोन देखता था। पांच घंटे के हिसाब से हफ्ते में 35 घंटे, महीने में 150 घंटे और साल में 1825 घंटे मोबाइल फोन की स्क्रीन पर जा रहे थे। जिसकी वजह से मेरा समय तो खराब हो ही रहा था, साथ ही आंखों पर भी जोर पड़ने लगा था और फोकस करने में भी दिक्कत आने लगी थी।”
राहुल बड़ी हैरानी से मोहित की बातें सुनता जा रहा था। अंत में मोहित ने राहुल से कहा, “भाई तू नाराज मत होना, कल मैं तेरा चैनल जरूर सब्सक्राइब कर दूंगा और हो सके तो तू भी सप्ताह में एक दिन डिजिटल उपवास रखने की कोशिश करना।” इतना कहकर मोहित वहां से चला गया।
मोहित के जाने के बाद राहुल का दिमाग काफी देर तक मोहित के बताए आंकड़ों में उलझा रहा। शायद पहली बार उसे एहसास हुआ था कि मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया में इंसान अपना कितना कीमती समय गंवा रहा है।
लेखक : राजू वैद्य ‘राज’
लेखक, अभिनेता एवं
समर्पण थिएटर ग्रुप के फाउंडर




